मिट्टी एवं पानी में अनेक सूक्ष्म जीव उपस्थित रहते हैं। सूक्ष्मजीव इतने छोटे होते हैं कि उन्हें बिना यंत्र की सहायता से नहीं देखा जा सकता। इनमें से कुछ जैसे कि ब्रेड पर उगने वाले कवक, को आवर्धकलेंस की सहायता से देखा जा सकता है जबकि अन्य बिना सूक्ष्मदर्शी की सहायता से दिखाई नहीं देते। यही कारण है कि इन्हें सूक्ष्मजीव कहते हैं।

अतः वे जीव जिन्हें मनुष्य नंगी आंखों से नही देख सकता तथा जिन्हें देखने के लिए सूक्ष्मदर्शी (Microscope) यंत्र की आवश्यकता पड़ती है, उन्हें सूक्ष्मजीव (Micro-organism) कहलाते हैं। सूक्ष्मजैविकी (microbiology) में सूक्ष्मजीवों का अध्ययन किया जाता है। अमीबा, जीवाणु, वायरस आदि सूक्ष्मजीव है। सूक्ष्मजीव एककोशिक हो सकते हैं जैसे कि जीवाणु, कुछ शैवाल एवं प्रोटोज़ोआ अथवा बहुकोशिक जैसे किकई शैवाल एवं कवक।

सूक्ष्मजीवों का आवास

यह बर्फीली शीत से ऊष्ण स्रोतों तक हर प्रकार की परिस्थिति में जीवित रहे हैं। यह मरुस्थल एवं दलदल में भी पाए जाते हैं। ये जीवों के शरीर में भी पाए जाते हैं। कुछ सूक्ष्मजीव दूसरे सजीवों पर आश्रित होते हैं जबकि कुछ अन्य स्वतंत्र रूप से पाए जाते हैं। अमीबा जैसा सूक्ष्मजीव अकेले रह सकता जबकि कवक एवं जीवाणु समूह में रहते हैं। सूक्ष्मजीव सामान्यतः हवा, पानी, मिट्टी, गर्म जल के स्रोतों, दलदली भूमि अर्थात सर्वत्र पाए जाते हैं।

सूक्ष्मजीवों के प्रकार

सूक्ष्मजीव के मुख्य प्रकार निम्नलिखित है: जीवाणु, कवक, प्रोटोजोआ, शैवाल, विषाणु, माइकोप्लाज्मा।

कवक (Fungi)

इन्हें फफूंद या फंगस भी कहते हैं। ये एक कोशिकीय से बहुकोशिकीय सरल संरचना वाले सूक्ष्मजीव होते हैं। इनकी कोशिकाओं में पर्णहरित नहीं पाया जाता है, इसलिए ये अपना भोजन स्वयं नहीं बना सकते हैं। कुछ कवक मृतोपजीवी के रूप में सड़े-गले कार्बनिक पदार्थों से अवशोषण की विधि द्वारा भोजन प्राप्त करते हैं जैसे-मशरूम। कुछ कवक पादपों एवं जन्तुओं परपरजीवी के रूप में भी पाए जाते हैं। उदाहरण गेहूँ पर पक्सिनिया ग्रेमिनिस ट्रिटीसाई (काला किट्ट रोग) तथाबाजरे पर स्कलेरोस्पोरा ग्रामिनीकोला (जोगण रोग) आदि। कुछ कवक शैवालों के साथ सहजीवी के रूप मेंभी पाए जाते हैं।

जीवाणु (Bacteria)

ये प्रोकैरियोटिक एक कोशिकीय जीव हैं। हमारे आस-पास के प्रत्येक स्थान पर जीवाणु पाए जाते हैं। उदाहरण ई. कोलाई, लेक्टोबेसिलस आदि।

प्रोटोजोआ (Protozoa)

ये एक कोशिकीय जीव हैं। उदाहरण अमीबा, पैरामीशियम आदि।

शैवाल (Algae)

ये एक कोशिकीय से बहुकोशिकीय सरल संरचना वाले पादप हैं। शैवालों की उपस्थिति के कारण ही तालाबों, नदियों, पोखरों और नालों आदि का पानी हरा दिखाई देता है। उदाहरण: क्लेमाइडोमोनास, क्लोरेला (यूकैरियोटिक, एक कोशिकीय), स्पाइरोगायरा, यूलोथ्रिक्स (यूकैरियोटिक, बहुकोशिकीय) एवं नील हरित शैवाल (प्रोकैरियोटिक, बहुकोशिकीय)।

विषाणु (Virus)

विषाणु सूक्ष्मतम संरचनाएँ हैं। ये अन्य सूक्ष्मजीवों से भिन्न हैं। इन्हें सजीव व निर्जीव के बीच की योजक कड़ी भी कहते हैं क्योंकि इसमें सजीव व निर्जीव दोनों के गुण पाए जाते हैं। प्रकृति में ये निर्जीव की तरह रहते हैैं लेकिन जब किसी परपोषी जैसे जीवाणु, पौधे अथवा जंतु कोशिका में प्रवेश करते हैं तो इनमें वृद्धि एवं गुणन होता है। यह पादपों एवं जन्तुओं में कई प्रकार के रोग फैलाता है। उदाहरण टोबेको मोजेक वायरस (TMV), ह्यूमन इम्यूनो डेफिशियन्सी वायरस (HIV) आदि।

माइकोप्लाज्मा (Mycoplasma)

माइकोप्लाज्मा सबसे छोटी कोशिका है जो जीवाणु फिल्टर में से भी छन जाती हैं। इसके द्वारा पादपों में बैंगन का लघुपर्ण एवं तिल की फिल्लोडी नामक रोग होते हैं। इन्हें पादप जगत के बहुरूपिया (Jokers of Plant Kingdom) भी कहते हैं।

सूक्ष्मजीवों के लाभ

सूक्ष्मजीवों का खाद्य सामग्री के निर्माण में उपयोग

जीवाणु दूध को दही में परिवर्तित कर देते हैं। दही में अनेक सूक्ष्मजीव पाए जाते हैं जिनमें लैक्टोबैसिलस नामक जीवाणु प्रमुख है जो दूध को दही में परिवर्तित कर देता है। वह दूध में जनन कर उसे दही में परिवर्तित कर देते हैं।

जीवाणु पनीर (चीज़), अचार एवं अनेक खाद्य पदार्थों के उत्पादन में सहायक हैं। रवा (सूजी), इडली एवं भटूरे का एक महत्त्वपूर्ण संघटक दही है। जीवाणु एवं यीस्ट चावल के आटे के किण्वण में सहायक होते हैं जिससे इडली एवं डोसा बनता है। यीस्ट तीव्रता से जनन करके श्वसन के दौरान कार्ब डाइऑक्साइड उत्पादित करते हैं। गैस के बुलबुले खमीर वाले मैदे का आयतन बढ़ा देते हैं। यह बेकिंग उद्योग में यीस्ट के उपयोग का आधार है जिसमें ब्रेड, पेस्ट्री एवं केक बनाए जाते हैं।

सूक्ष्मजीवों का वाणिज्यिक उपयोग

बड़े स्तर पर एल्कोहल, शराब एवं एसिटिक एसिड के उत्पादन में सूक्ष्मजीवों का उपयोग किया जाता है। जौ, गेहूँ, चावल एवं फलों के रस में उपस्थित प्राकृतिक शर्करा में यीस्ट द्वारा एल्कोहल एवं शराब का उत्पादन किया जाता है।

सूक्ष्मजीवों के औषधीय उपयोग

प्रतिजैविक औषधियों का स्रोत सूक्ष्मजीव हैं। ये बीमारी पैदा करने वाले सूक्ष्मजीवों को नष्ट कर देती हैं अथवा उनकी वृद्धि को रोक देती हैं। इस प्रकार की औषधि को प्रतिजैविक (Antibiotic) कहते हैं। स्ट्रेप्टोमाइसिन, टेट्रासाइक्लिन और एरिथ्रोमाइसिन सामान्य रूप से उपयोग की जाने वाली प्रतिजैविक हैं जिन्हें कवक एवं जीवाणु से उत्पादित किया जाता है। किसी विशिष्ट प्रकार के सूक्ष्मजीव का संवर्धन करके प्रतिजैविक का उत्पादन किया जाता है जिन्हें अनेक रोगों की चिकित्सा में उपयोग में लाते हैं। सूक्ष्मजीवों से टीके का उत्पादन बड़े स्तर पर किया जाता है जिसमें मनुष्य एवं अनेक जंतुओं को अनेक रोगों से बचाया जाता है।

मिट्टी की उर्वरता में वृद्धि

कुछ जीवाणु एवं नीले-हरे शैवाल वायुमण्डलीय नाइट्रोजन का स्थिरीकरण कर सकते हैं। इस प्रकार मृदा में नाइट्रोजन का संवर्धन होता है तथा उसकी उर्वरता में वृद्धि होती है। इन्हें सामान्यतः जैविक नाइट्रोजन स्थिरीकारक कहते हैं।

पर्यावरण के शुद्धिकरण में उपयोग

सूक्ष्मजीव, मृत जैविक अवशिष्ट का अपघटन करके उन्हें सरल पदार्थों में परिवर्तित कर देते हैं। यह पदार्थ अन्य पौधों एवं जंतुओं द्वारा पुनः उपयोग कर लिए जाते हैं। इस प्रकार हानिकारक एवं दुर्गंधयुक्त पदार्थों का निम्नीकरण करने के लिए हम सूक्ष्मजीवों का उपयोग करके पर्यावरण का शुद्धिकरण कर सकते हैं।

सूक्ष्मजीवों से हानि

विभिन्न जीवों में रोग उत्पन्न करना

कुछ सूक्ष्मजीव मनुष्य, जंतुओं एवं पौधों में रोग उत्पन्न करते हैं। रोग उत्पन्न करने वाले सूक्ष्मजीवों को रोगाणु कहते हैं। मनुष्य मे क्षय (T.B.), कुकर खाँसी, डिप्थीरिया, टिटनेस, हैजा, मलेरिया, चर्म रोग आदि इन्हीं सूक्ष्मजीवों के कारण होते हैं। एन्थ्रेक्स मनुष्य एवंजन्तुओं में सूक्ष्म जीवों से होने वाला भयानक रोग है। गाय में खुरपका एवं मुँहपका रोग वायरस द्वारा होता है। नींबू का केंकर (जीवाणुजनित), गेहूँ की रस्ट(कवकजनित), भिन्डी का पीत सिरा मोज़ेक (वाइरस जनित) आदि रोग सूक्ष्मजीव द्वारा होते हैं।

मनुष्य में रोगकारक सूक्ष्मजीव

मनुष्य में रोग उत्पन्न करने वाले सूक्ष्मजीव श्वास द्वारा, पेय जल एवं भोजन द्वारा हमारे शरीर में प्रवेश करते हैं। संक्रमित व्यक्ति अथवा जंतु के सीधे संपर्क में आने पर भी रोग का संचरण हो सकता है। सूक्ष्मजीवों द्वारा होने वाले ऐसे रोग जो एक संक्रमित व्यक्ति से स्वस्थ व्यक्ति में वायु, जल, भोजन अथवा कायिक संपर्क द्वारा फैलते हैं, संचरणीय रोग कहलाते हैं। इस प्रकार के रोगों के कुछ उदाहरण हैजा, सामान्य सर्दी-जुकाम, चिकनपॉक्स एवं क्षय रोग। जब जुकाम से पीड़ित कोई व्यक्ति छींकता है तो सूक्ष्म बूंदों के साथ हज़ारों रोगकारक वायरस (विषाणु) भी वायु में आ जाते हैं। यह वायरस श्वास के साथ ली जाने वाली वायु के साथ शरीर में प्रवेश कर जाते हैं।

कुछ कीट एवं जंतु ऐसे भी हैं जो रोगकारक सूक्ष्मजीवों के रोग-वाहक का कार्य करते हैं। घरेलू मक्खी इसका एक उदाहरण है। मक्खी कूड़े एवं जंतु अपशिष्ट पर बैठती है। रोगाणु उसके शरीर से चिपक जाते हैं। जब मक्खी बिना ढके भोजन पर बैठती है तो रोगाणु का स्थानान्तरण संभव है। जो भी व्यक्ति ऐसा संदूषित भोजन करेगा उसके बीमार पड़ने की संभावना है। मादा एनॉफ्लीज़ मच्छर इसका अन्य उदाहरण है। मच्छर प्लैज्मोडियम (मलेरिया परजीवी) का वाहक है। मादा एडीस मच्छर डेंगू के वायरस का वाहक है।

मानव रोगरोगकारक सूक्ष्मजीव
क्षय रोगजीवाणु
खसरावायरस
चिकनपॉक्सवायरस
पोलियोवायरस
हैजाजीवाणु
टाइफाइडजीवाणु
हैपेटाइटिस-एवायरस
मलेरियाप्रोटोजोआ
अतिसारप्रोटोजोआ
मनुष्य में सूक्ष्मजीवों द्वारा होने वाले रोग

पादपों में रोगकारक सूक्ष्मजीव

पादप रोगरोगकारक सूक्ष्मजीव
नींबू कैंकरजीवाणु
गेहूं की रस्टकवक
भिंडी का पीत सिरा मोजेकवायरस
पौधों में सूक्ष्मजीवों द्वारा होने वाले रोग

जन्तुओं में रोगकारक सूक्ष्मजीव

गाय में खुर एवं मुंह का रोग वायरस द्वारा होता है।

खाद्य पदार्थों को हानि पहुँचाना

अनाज, दालें, पके हुए फल, भोजन, अचार आदि सूक्ष्मजीवों के कारण खराब हो जाते हैं अतः इन्हें सूक्ष्मजीवों के संक्रमण से बचाना चाहिए।

खाद्य पदार्थों को विषाक्त करना

क्लोस्ट्रीडियम बॉटुलिनम जीवाणु खाद्य पदार्थों को विषाक्त कर देते हैं जिससे इन्हें ग्रहण करने वालों को उल्टी-दस्त होने लगती है और कभी-कभी मृत्यु भी हो सकती है।

बहुमूल्य वस्तुओं को नष्ट करना

कपड़े, कागज, लकड़ी, चमड़ा आदि से बनी सभी प्रकार की बहुमूल्य वस्तुओं को सूक्ष्मजीव खराब कर देते हैं जिससे उनकी गुणवत्ता कम हो जाती है।

कुछ सूक्ष्मजीव एवं उनके लाभ

राइजोबियम जीवाणु

यह दलहनी पौधे जैसे मूंग, मोठ, चना, मटर‌ की जड़ गुलिकाओं में पाए जाते है। ये वायुमंडल की नाइट्रोजन को नाइट्रेट में बदलने में सहायक है। नाइट्रेट से भूमि उपजाऊ बनती है। पौधों में नाइट्रोजन का मुख्य स्रोत यही नाइट्रेट नामक यौगिक है। नाइट्रोजन प्रोटीन का अभिन्न घटक है। किसान इसी कारण 1 वर्ष दलहनी फसल जैसे मूंग, मोठ, ग्वार तथा दूसरे वर्ष अनाजी फसल जैसे बाजरा, ज्वार, आदि की बुवाई करता है।

क्लोरेला

यह एक शैवाल है। यह यूकैरियोटिक, एक कोशिकीय जीव है। क्लोरेला का उपयोग सूप एवं अन्य खाद्य पदार्थ बनाने में किया जाता है। क्लोरेला निर्मित खाद्य सामग्री का उपयोग आइसक्रीम बनाने में भी किया जाता है।

क्लोस्ट्रीडियम बाॅटूलिनम

यह एक जीवाणु है, जिससे विटामिन B12 प्राप्त किया जाता है।

जेन्थोमोनास कैम्पेसिट्रस

जेन्थोमोनास कैम्पेसिट्रस नामक सूक्ष्मजीव का उपयोग टूथपेस्ट बनाने में किया जाता है।

लेक्टोबेसिलस

दूध से दही बनाने में लैक्टोबेसिलस जीवाणु उपयोगी होते हैं। यह प्रौकैरियोटिक, एक कोशिकीय जीव है।

पेनिसिलियम

यह एक कवक है, इससे पेनिसिलिन नामक औषधि बनाई जाती है। इसका उपयोग टीके एवं प्रतिजैविक के रूप में किया जाता है पेनिसिलिन की खोज एलेग्जेंडर फ्लेमिंग द्वारा की गई।

एन्थेक्नॉइड बेसिलाई

एन्थेक्नॉइड बेसिलाई जीवन का उपयोग रोग प्रतिरोधक पदार्थ बनाने में किया जाता है।

कुछ सूक्ष्मजीव एवं उनकी हानियां

ई कोलाई

यह एक जीवाणु है। यह प्रौकैरियोटिक, एक कोशिकीय जीव है।

क्लोस्ट्रीडियम बाॅटूलिनम

क्लोस्ट्रीडियम बाॅटूलिनम जीवाणु खाद्य पदार्थों को विषाक्त कर देते हैं। जिससे इन्हें ग्रहण करने वालों को उल्टी दस्त होने लगती है और कभी-कभी मृत्यु भी हो सकती है।

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