अतिचालकता

अतिचालकता की खोज एक डच भौतिकशास्त्री कैमरलिंग ओनिस द्वारा 1911 में की गयी। अत्यन्त निम्न ताप पर कुछ पदार्थों का विद्युत प्रतिरोध शून्य हो जाता है। इन्हें ‘अतिचालक’ (Super-conductor) कहते हैं और इस गुण को ‘अतिचालकता’ कहते हैं।

4.2 k (अर्थात् – 268.8°C) पर पारा अतिचालक बन जाता है, अर्थात् उसका विद्युत प्रतिरोध शून्य हो जाता है, यदि उस समय उसमें धारा प्रवाहित की जाए तो वह अनन्त काल तक बहती रहेगी, उसमें कोई कमी नहीं आएगी। कुछ मिश्र धातुएं, जैसे—नियोबियस्टन काफी ऊंचे ताप पर भी अतिचालकता प्राप्त कर लेती है

अतिचालक का दूसरा महत्त्वपूर्ण गुण यह होता है, कि वह पूर्णतः प्रतिचुम्बकीय होता है, अर्थात् वह पूर्ण ‘चुम्बकीय कवच’ होता है जिसे कोई चुम्बकीय बल-रेखा भेदकर उसके अन्दर नहीं जा सकती है। कोई पदार्थ जिस ताप पर अतिचालक बनता है उसे उसका ‘क्रांतिक ताप’ (Critical temperature) कहते हैं।